
The mukhbir शहडोल। शहर का मुख्य बस स्टैंड रविवार की दोपहर एक दिल दहला देने वाली घटना का गवाह बन गया। ड्यूटी कर रहे कोतवाली थाने के आरक्षक महेश पाठक को तेज रफ्तार यात्री बस ने कुचल दिया। कुछ ही पलों में सबकुछ खत्म हो गया. एक परिवार का सहारा, एक ड्यूटी के प्रति समर्पित जवान और एक जिम्मेदार पुलिसकर्मी।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि दादू एंड बस सर्विस की बस जबरदस्त रफ्तार से स्टैंड में घुसी और प्रवेश द्वार पर खड़े आरक्षक को सीधे चपेट में ले लिया। टक्कर इतनी भीषण थी कि आरक्षक ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। घटना के बाद बस स्टैंड में अफरा-तफरी मच गई, लोग स्तब्ध रह गए और मौके पर चीख-पुकार गूंज उठी।
सूचना मिलते ही यातायात पुलिस, कोतवाली पुलिस और अतिरिक्त बल मौके पर पहुंचा। चालक को हिरासत में ले लिया गया है और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया।
लेकिन हादसे के बाद खड़े होने वाले बड़े सवाल अभी भी हवा में तैर रहे हैं. जवाब किसी के पास नहीं।
बिना परमिट दौड़ रही बसें…किसकी शह पर चल रहा है ये खेल
स्थानीय लोगों का आरोप बेहद गंभीर है. कि कई बसें लंबे समय से बिना परमिट चल रही हैं, विवादों में घिरी रहती हैं और परिवहन विभाग की आंखों के सामने सड़कों पर दौड़ रही हैं। हाल ही में बिना परमिट संचालन पर कार्रवाई भी हुई थी, लेकिन
क्या कार्रवाई सिर्फ कागजों में हुई.
क्या जुर्माना भरकर बसें फिर से सड़क पर उतार दी गईं.
और अब इसकी कीमत एक पुलिस आरक्षक की जान से क्यों चुकानी पड़ी.
यह सवाल सिर्फ एक हादसे के नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही पर दस्तक दे रहे हैं।
सिस्टम की चूक… और एक जवान की जान
शहडोल बस स्टैंड पर रोज हजारों लोग आते-जाते हैं। प्रवेश द्वार पर ड्यूटी पर मौजूद जवानों की सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम हैं.
क्या बसों के प्रवेश-निकास पर कोई नियंत्रित व्यवस्था है.
क्या बस ऑपरेटर मनमर्जी से वाहन नहीं घुसाते.
आरक्षक महेश पाठक की मौत कहीं न कहीं सिस्टम की लापरवाही की भी गवाही देती है।
पुलिस अधीक्षक रामजी श्रीवास्तव ने जांच के आदेश दे दिए हैं, लेकिन जांच तभी सार्थक होगी जब…
• बिना परमिट बसों पर कड़े कदम उठें
• बस स्टैंड की यातायात प्रणाली में सुधार हो
• दोषियों पर सिर्फ कार्रवाई नहीं, उदाहरण वाली सजा हो
एक ड्यूटी पर तैनात जवान… और अधूरी जिम्मेदारियां
महेश पाठक रोज की तरह ड्यूटी पर थे। फर्क सिर्फ इतना था कि आज एक तेज रफ्तार बस ने उनकी जिंदगी छीन ली। अब सवाल यह भी है.
क्या उनकी मौत सिर्फ एक हादसा है या अंकुश रहित परिवहन तंत्र की ‘सिस्टम फेलियर’ का परिणाम.
परिवार शोक में है, विभाग सदमे में है और शहर गुस्से में।
अब वक्त है कार्रवाई का, बयानबाजी का नहीं
शहडोल में वर्षों से बिना परमिट बसों का संचालन किसी से छुपा नहीं है। हर हादसे के बाद जांच होती है, रिपोर्ट बनती है… और कुछ दिनों बाद सबकुछ सामान्य हो जाता है।
लेकिन इस बार मामला एक पुलिस आरक्षक की शहादत का है। यदि अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाले दिनों में ऐसे हादसे फिर सामने आएंगे।
परिवहन विभाग से सवाल…
कब तक नियम तोड़ने वाले बस ऑपरेटर यूं ही जान लेते रहेंगे, और कब तक विभाग सिर्फ बयान देता रहेगा..
The mukhbir से जितेंद्र कुमार विश्वकर्मा
Author: The Mukhbir
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