–गहरे पानी में दबी रही लाश, कई रेस्क्यू फेल, सिस्टम खामोश, कागजों में पहले ही घोषित हो गई मौत…

–SECL और RKTC की लापरवाही पर गहराया संकट
The mukhbir राहुल सिंह राणा, शहडोल। जिले के धनपुरी थाना क्षेत्र अंतर्गत SECL सोहागपुर एरिया की बंद पड़ी अमलाई ओपन कास्ट माइन में 11 अक्टूबर 2025 की शाम हुआ हादसा अब सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की निष्ठुरता, लापरवाही और कागजी संवेदनाओं का भयावह दस्तावेज बन चुका है।
करीब तीन महीने बाद आखिरकार टीपर ऑपरेटर अनिल कुशवाहा (27 वर्ष) का शव खदान के गहरे पानी से बाहर निकाला गया। लगातार पानी निकासी के बाद SDERF शहडोल-अनूपपुर की संयुक्त टीम ने मंगलवार दोपहर भारी मशक्कत के बाद शव बरामद किया। शव की हालत इतनी भयावह थी कि लंबे समय तक पानी और कीचड़ में दबे रहने से वह सड़ कर कंकाल जैसी अवस्था में बदल गई थी।
हादसे की भयावह तस्वीर
11 अक्टूबर को बंद खदान में मिट्टी फिलिंग के दौरान अचानक मिट्टी स्लाइडिंग हुई। RKTC ठेका कंपनी का डोजर मशीन, टीपर ट्रक और ऑपरेटर अनिल कुशवाहा गहरे दलदली पानी में समा गए।
इस हादसे में दो अन्य कर्मचारी गंभीर रूप से घायल हुए। रेस्क्यू के लिए NDRF, SDERF, इंडियन आर्मी, जिला प्रशासन और स्थानीय एजेंसियां कई दिनों तक जुटी रहीं, लेकिन खदान में भरे लाखों लीटर पानी और कीचड़ ने हर कोशिश नाकाम कर दी।
आखिरकार एक माह बाद रेस्क्यू को बंद कर दिया गया और सिस्टम ने मानो हाथ खड़े कर दिए।
शव से पहले मृत्यु प्रमाण पत्र
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि शव मिलने से करीब दो महीने पहले ही मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया। अब, तीन महीने बाद शव मिलने पर पोस्टमार्टम किया जाएगा। परिजनों ने इस पूरे मामले को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की है, जहां मामला विचाराधीन है।
सवाल साफ…
जब शव मिला ही नहीं था, तो मौत किस आधार पर दर्ज कर दी गई..?
क्या यह सिर्फ प्रशासनिक जल्दबाजी थी या किसी बड़े सच पर पर्दा डालने की कोशिश..?

तीन महीने बाद ‘सफल’ रेस्क्यू… लेकिन जवाबदेही कौन लेगा..
घटना के बाद से ही खदान से लगातार पानी निकाला जा रहा था। 6 जनवरी 2026 मंगलवार सुबह SECL प्रबंधन ने SDERF कि टीम को बताया कि ट्रक दिखाई दे रहा है। कलेक्टर डॉ. केदार सिंह के निर्देश पर शहडोल-अनूपपुर की संयुक्त टीम ने रेस्क्यू को अंजाम दिया।
शहडोल टीम में पी. सी. कोमल (टीम प्रभारी) के नेतृत्व में 8 सदस्यीय SDERF दल शामिल रहा, जिनमें नरेंद्र सिंह परमार, चौथमल दांगी, शारदा प्रसाद, अजेश मिश्रा, मोहन सिंह भिलाला, कामता प्रसाद और मदन सिंह ने जोखिम उठाकर शव बाहर निकाला।
मौत कि खदान और खामोश सिस्टम
यह घटना सिर्फ अनिल कुशवाहा की मौत नहीं है.
यह SECL-RKTC, ठेका व्यवस्था, सुरक्षा मानकों और प्रशासनिक जवाबदेही पर करारा तमाचा है।
तीन महीने तक एक युवक की लाश खदान में दबी रही, रेस्क्यू थम गया और फाइलों में मौत पहले लिख दी गई. और इंसाफ आज भी अदालत के दरवाजे पर खड़ा है।
सवाल अब भी जिंदा…
जिम्मेदार कौन..? क्योंकि सच अब गहरे पानी से बाहर आ चुका है.
Author: The Mukhbir
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