
शहडोल में सुस्ती, लापरवाही और दिखावे की कार्रवाई पर सवाल
The mukhbir शहडोल। शहर के मुख्य बस स्टैंड पर रविवार को जो दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे शहर को झकझोर दिया। ड्यूटी पर तैनात कोतवाली थाने के आरक्षक महेश पाठक को तेज रफ्तार दादू एंड संस की यात्री बस ने कुचल दिया। कुछ ही पलों में एक परिवार का सहारा, एक जिम्मेदार पुलिसकर्मी और कर्तव्यनिष्ठ जवान हमेशा के लिए खो गया। दर्द और आक्रोश से भरा शहर जब जवाब मांग रहा था, तभी आरटीओ विभाग का “मध्यरात्रि ड्रामा” शुरू हुआ।
दुर्घटना के बाद जागा आरटीओ पहले कहां थी मैडम
घटना के बाद रातों-रात आरटीओ अनपा खान और टीम बस स्टैंड पहुंची और बसों की चेकिंग का दिखावा करने लगी।
लेकिन सवाल यह है कि
जब बस स्टैंड पर 24 घंटे स्थानीय बसों का अवैध जमावड़ा रहता है, तब विभाग सोया क्यों रहता है.
परमिट, फिटनेस, रजिस्ट्रेशन और रूट की जांच पहले क्यों नहीं होती.
किसके संरक्षण में बिना परमिट की बसें खुलेआम दौड़ रही थीं.
सूबेदार प्रियंका शर्मा लगातार कार्रवाई
उस समय आरटीओ विभाग मौन क्यों था. यातायात विभाग की सूबेदार प्रियंका शर्मा कई दिनों से बिना परमिट वाली बसों पर लगातार कार्रवाई कर रही थीं, चालान भी काटे गए।
लेकिन उसी अवधि में आरटीओ कार्यालय गहरी नींद में था।
न चेकिंग, न निगरानी और न ही अवैध परिवहन पर कोई ठोस कार्रवाई।
ऐसा लगता है जैसे आरटीओ विभाग को जिम्मेदारी तब याद आती है जब जान जाने के बाद दिखावा करना हो।
आरक्षक की शहादत ने खोली पोल: अवैध परिवहन ने लिया एक जवान की जान
बस स्टैंड पर बिना नियमों वाली बसों का मनमानी संचालन अब किसी से छुपा नहीं है।
तेज रफ्तार, ओवरलोडिंग और बिना परमिट वाहन…इन्हीं की काली करतूतों ने एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिसकर्मी की जान ले ली।
और जिस विभाग को इस अराजकता को नियंत्रित करना था, वह पिछले कई महीनों से अपनी जिम्मेदारी से भागता रहा।
जनता पूछ रही..आरटीओ की जवाबदेही कौन तय करेगा
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क्या आरटीओ विभाग बताएगा कि वर्षों से बस स्टैंड पर हो रही अवैध गतिविधियों को क्यों अनदेखा किया गया.
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क्या केवल एक रात की चेकिंग से प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से बच जाएगा.
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क्या शहीद आरक्षक महेश पाठक की मौत का जिम्मेदार केवल बस चालक है या वह सिस्टम भी, जो लापरवाह और सुस्त बना हुआ है.
सिर्फ कार्रवाई नहीं, जवाब चाहिए
इस दर्दनाक घटना के बाद जनता अब दिखावे की कार्रवाई नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और लगातार निगरानी की मांग कर रही है।
आरक्षक की शहादत ने एक बार फिर साबित किया है कि जब जिम्मेदार विभाग लापरवाह हो जाएं, तो कीमत आम लोगों और जवानों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है।
शहडोल अब जवाब चाहता है, आरटीओ विभाग की नींद आखिर कितनी महंगी पड़ेगी…
The mukhbir से चंदन कुमार वर्मा कि रिपोर्ट
Author: The Mukhbir
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