
नाबालिग से छेड़छाड़ को ‘रेप की कोशिश’ मानने का रास्ता साफ
The mukhbir। नाबालिगों से जुड़े यौन अपराधों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक अहम फैसला सुनाया है। 8 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादित आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि नाबालिग लड़की के स्तन को पकड़ना, पायजामे की डोरी तोड़ना और पुल के नीचे घसीटने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश की श्रेणी में नहीं आता।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न केवल इस केस के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, बल्कि देशभर की अदालतों के लिए भविष्य में ऐसे मामलों में एक स्पष्ट दिशा भी तय करती है।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा…
“हम हाईकोर्ट के आदेश को खारिज करते हैं। इस केस में अब धारा 376 (रेप) और POCSO एक्ट की धारा 18 (रेप की कोशिश) के तहत ही सुनवाई होगी।”
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि नाबालिग से जुड़े यौन अपराधों में अदालतों को बेहद संवेदनशील, जिम्मेदार और सावधानीपूर्वक शब्दों का उपयोग करना चाहिए। साथ ही, CJI सूर्यकांत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों पर टिप्पणी करते समय सभी हाईकोर्ट्स के लिए एक स्पष्ट गाइडलाइन बनाए जाने की आवश्यकता है।
कौन-सा केस था जिसकी वजह से विवाद शुरू हुआ
मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले का है। घटना साल 2021 की है।
- 10 नवंबर 2021 को एक मां अपनी बेटी और बेटे के साथ घर लौट रही थी।
- रास्ते में तीन युवक बाइक से मिले।
- एक युवक ने लड़की को घर छोड़ने का भरोसा दिलाया।
- रास्ते में बाइक रोककर तीनों ने लड़की के साथ छेड़छाड़ की।
- उसके प्राइवेट पार्ट्स को छुआ गया।
- पायजामे की डोरी तोड़कर उसे पुल के नीचे घसीटने की कोशिश की गई।
मामला कासगंज की स्पेशल कोर्ट में पहुंचा और दो अभियुक्तों पर IPC 376 और POCSO एक्ट की धारा 18 लगाई गई।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा था
जब अभियुक्तों ने इस मामले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की सिंगल बेंच ने यह विवादित टिप्पणी की..
“स्तन छूने और पायजामे की डोरी तोड़ने को रेप या रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता।”
हाईकोर्ट ने निचली अदालत को कहा कि इस मामले में IPC 354B (कपड़े उतारने की नीयत से हमला) और POCSO की धारा 9 व 10 (गंभीर यौन हमला) के तहत ट्रायल चलाया जाए।
इस टिप्पणी को कानूनी विशेषज्ञों, महिला संगठनों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने कड़ा विरोध किया।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि:
- नाबालिग को पुल के नीचे घसीटने की कोशिश
- उसके कपड़ों को निशाना बनाना
- उसके संवेदनशील अंगों को छूना
इन सभी परिस्थितियों से स्पष्ट है कि उद्देश्य गंभीर यौन अपराध था, जिसे हल्का नहीं आंका जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में:
- पीड़िता की उम्र
- परिस्थितियाँ
- अपराधियों के व्यवहार
को ध्यान में रखते हुए कठोर और संवेदनशील दृष्टिकोण जरूरी है।
भविष्य के लिए क्या संकेत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों में:
- अदालतें शब्दों के चयन में सावधानी बरतें
- पीड़िता की गरिमा सर्वोपरि रहे
- नाबालिग पीड़ितों के मामलों में स्पष्ट न्यायिक गाइडलाइन जरूरी है
यह फैसला न केवल इस केस के लिए, बल्कि आगे आने वाले सभी POCSO मामलों के लिए एक निर्णायक मानक स्थापित करता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि नाबालिग के साथ इस तरह की हरकत को साधारण छेड़छाड़ नहीं माना जा सकता। यह गंभीर यौन अपराध की कोशिश है, जिसे कानून के सबसे कठोर प्रावधानों में ही परखा जाना चाहिए।
यह फैसला बच्चों की सुरक्षा, उनके अधिकारों और न्यायिक संवेदनशीलता की दिशा में एक मजबूत कदम है।
The mukhbir टीम









