April 17, 2026 8:47 pm

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शहडोल रेत समूह का अस्थायी संचालन: नियम 26-(2) के नाम पर होगा करोड़ों का खेल

The mukhbir राहुल सिंह राणा, शहडोल।
मध्यप्रदेश स्टेट माइनिंग कारपोरेशन लिमिटेड, भोपाल द्वारा पत्र क्रमांक रेत/2025-26/610 दिनांक 22-12-2025 के माध्यम से जिला रेत समूह शहडोल के संचालन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं चौंकाने वाला निर्णय सामने आया है। यह पत्र मेसर्स बाबा महाकाल मिनरल्स लिमिटेड, कटनी को संबोधित करते हुए मध्यप्रदेश रेत (खनन, परिवहन, भण्डारण तथा व्यापार) नियम, 2019 के नियम 26-(2) के अंतर्गत जिला रेत समूह शहडोल के संचालन हेतु सीधी सहमति आमंत्रित करता है।

ई-निविदा विफल, जिला असंचालित

पत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि शहडोल जिला समूह के लिए ई-निविदा सह नीलामी के माध्यम से एम.डी.ओ. (माइन डेवलपर ऑपरेटर) नियुक्त करने के प्रयास किए गए, किंतु यह प्रक्रिया सफल नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप वर्तमान में पूरे जिले का रेत समूह असंचालित है। यह स्थिति अपने-आप में कई सवाल खड़े करती है. क्या निविदा प्रक्रिया जानबूझकर विफल कराई गई
क्या नियम 26(2) को “आपातकालीन रास्ते” की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.

रेत का गणित, तीन माह में 22.90 करोड़

पत्र के अनुसार शहडोल जिले की कुल निविदत्त मात्रा: 17,60,000 (सत्रह लाख साठ हजार) घनमीटर आमंत्रित अवधि: केवल 3 माह, स्वीकृत मात्रा: 4,40,000 घनमीटर, निर्धारित दर: ₹520.62 प्रति घनमीटर और कुल राशि: ₹22,90,72,800 (लगभग 23 करोड़ रुपये) तीन माह में लगभग 23 करोड़ का कारोबार और वह भी बिना खुली प्रतिस्पर्धी नीलामी के अपने-आप में गंभीर विमर्श का विषय है।

नियम 26(2): अस्थायी व्यवस्था या स्थायी फायदा

नियम 26-(2) का उद्देश्य तब लागू होता है जब
जिला समूह में एम.डी.ओ. नियुक्त न हो सके
या किसी कारणवश संचालन बाधित हो
लेकिन सवाल यह है कि क्या इस नियम का प्रयोग केवल अस्थायी समाधान के लिए हो रहा है।
या फिर यह किसी खास कंपनी को लाभ पहुंचाने का शॉर्टकट रास्ता बनता जा रहा है।
पत्र में यह भी उल्लेख है कि यदि इस 3 माह की अवधि के पूर्व नया अनुबंध निष्पादित हो जाता है, तो वर्तमान अनुबंध स्वतः समाप्त मान लिया जाएगा और समानुपातिक राशि वसूली जाएगी। यह शर्त प्रशासनिक सुरक्षा ज़रूर दर्शाती है, लेकिन व्यवहार में इसकी निगरानी और पारदर्शिता सबसे बड़ा प्रश्न बनी हुई है।

शहडोल की रेत, किसके हाथ

शहडोल जिला पहले ही रेत के अवैध उत्खनन, परिवहन और प्रशासनिक शिथिलता को लेकर चर्चा में रहा है। ऐसे में सीधे सहमति के आधार पर संचालन, स्थानीय प्रतिस्पर्धा खत्म करता है. छोटे ठेकेदारों को बाहर करता है और रेत कारोबार को चुनिंदा हाथों में सौंपने का रास्ता खोलता है.

जनहित में उठते सवाल

अब आवश्यकता है कि नियम 26-(2) के प्रयोग की स्वतंत्र समीक्षा हो ई-निविदा विफल होने के कारणों को सार्वजनिक किया जाए। संचालन अवधि में उत्खनन, परिवहन और राजस्व की पारदर्शी निगरानी हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि शहडोल की रेत राजस्व और पर्यावरण दोनों के साथ समझौता न बने।
यह पत्र केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि शहडोल जिले की रेत नीति, राजस्व व्यवस्था और पारदर्शिता की परीक्षा है। अगर नियम 26-(2) “अपवाद” से निकलकर “साधारण प्रक्रिया” बन गया, तो यह भविष्य में बड़े सवालों और विवादों की नींव भी रख सकता है।
शहडोल की रेत किसके हित में बहेगी चुनिंदा कंपनियों कि या छोटे ठेकेदार..इसका जवाब आने वाले तीन महीनों में खुद मिल जाएगा।
The Mukhbir
Author: The Mukhbir

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