
नगर परिषद जयसिंहनगर में ‘अध्यक्ष पुत्र राज’ पर सवालों की आँधी
शहडोल/जयसिंहनगर। लोकतंत्र में संवैधानिक पद जनता के लिए होते हैं. पर जयसिंहनगर नगर परिषद में हालात उलटे दिख रहे हैं। यहाँ सत्ता का अर्थ सेवा नहीं बल्कि निजी सुविधा में ढला हुआ दिखने लगा है। ‘सरपंच पति’, ‘पार्षद पति’, ‘‘विधायक पति’’ और ‘‘सांसद पति’’ जैसे शब्दों के बाद अब एक नया शब्द तेजी से चर्चा में है.“अध्यक्ष पुत्र” और इसके साथ सत्ता के दुरुपयोग का ऐसा नमूना सामने आया है जिसने पूरे नगर में आक्रोश की लहर पैदा कर दी है।
अध्यक्ष पुत्र और विवाद—पुराना रिश्ता, नए हथकंडे
नगर परिषद अध्यक्ष का पुत्र पिछले कुछ समय से लगातार विवादों की जड़ बना हुआ है। जनता के बीच चर्चा यह है कि यह “अध्यक्ष पुत्र” अपनी निजी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अध्यक्ष की कुर्सी की परछाई में पनप रहे रौब से पहचाना जाता है। जहाँ जनप्रतिनिधि की भूमिका समाज सुधार होनी चाहिए, वहाँ इस मामले में संवैधानिक ताकत का उपयोग उल्टा स्व-हित, जमीन कब्ज़ा, और नगरीय संसाधनों के व्यक्तिगत इस्तेमाल की तरफ होता दिखता है।
यह केवल चर्चा नहीं, बल्कि अब प्रशासन के लिए चुनौती बन चुका प्रामाणिक शिकायतों वाला गंभीर प्रकरण है।
जनप्रतिनिधि ने खोला मोर्चा, दो बिंदुओं में ‘सीधा भ्रष्टाचार’ उजागर
समाजसेवी व जनप्रतिनिधि द्वारा सीएमओ को सौंपे गए दो-सूत्रीय शिकायत पत्र ने पूरे मामले की तस्वीर साफ कर दी नगर परिषद के संसाधनों का अध्यक्ष परिजन द्वारा निजी उपयोग और पद की राजनीतिक शक्ति का संकेतात्मक दुरुपयोग। ऐसे आरोप किसी नागरिक के नहीं, बल्कि साक्ष्य-आधारित और प्रत्यक्ष रूप से देखे गए प्रकरणों पर आधारित हैं। नागरिकों में यह महसूस किया जा रहा है कि जिस परिषद से उन्हें सुविधाएँ मिलनी थीं, वही संसाधन अब सत्ता-परिवार की निजी “मशीनरी” बन चुके हैं।
टैंकर से निजी मकान की सिंचाई, खुलेआम सत्ता का दुरुपयोग
वार्ड क्रमांक 4, रीवा रोड यहीं से विवाद की नींव गहराती है। अध्यक्ष के परिजन का मकान और उसके ऊपर निर्माणाधीन दुसरी मंज़िल। और इसी निर्माण के लिए नगर परिषद का सरकारी टैंकर, सीधे-सीधे निजी मकान की सिंचाई में उपयोग होता हुआ देखा गया। ये केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा का सार्वजनिक अपमान है. जहाँ जनता को पानी के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है, वहाँ सत्ता-परिवार के निजी भवन को सीधा “सरकारी नल” से सिंचाई मिल रही है।
भूमि ही विवादित, कूटरचित दस्तावेज़ों से कब्ज़ा करने का आरोप
स्थानीय निवासियों और आसपास के लोगों के अनुसार
- भूमि आदिवासी स्वामित्व की बताई जा रही है।
- वारिस न होने का लाभ उठाकर छलपूर्वक भू-स्वामित्व हासिल किया गया।
- रुपये और प्रभाव के दम पर कब्ज़ा लेकर तेजी से निर्माण खड़ा किया गया।
अब इस निर्माण को तेजी से खड़ा करने में नगर परिषद के संसाधनों का उपयोग होना. भ्रष्टाचार का खुला संकेत बन चुका है।
दो कुर्सियाँ, एक अध्यक्ष की, एक अध्यक्ष पुत्र की: संवैधानिक व्यवस्था का मज़ाक
नगर परिषद कार्यालय में अध्यक्ष के बगल में “अध्यक्ष पुत्र” के लिए स्थायी कुर्सी यह दृश्य जनता के मन में यह सवाल छोड़ गया है. क्या जयसिंहनगर में लोकतंत्र चल रहा है या फिर ‘वंशानुगत सत्ता का युवा संस्करण’…सार्वजनिक कार्यालय में केवल निर्वाचित पदाधिकारी की कुर्सी ही मान्य होती है। लेकिन यहाँ “अध्यक्ष पुत्र” का अनौपचारिक सिंहासन लगातार यह संदेश दे रहा है कि सत्ता केवल कार्यालय में नहीं, रौब में भी चलती है। अचंभे की बात यह है कि नगर परिषद अधिकारी इस पर मौन हैं, जो इनके स्वयं के आचरण को संदिग्ध बना देता है।
जनता का आक्रोश, सत्ता के खिलाफ उठती नई आवाज़
जब जनता ने अध्यक्ष से उम्मीदें लगाईं, तब उन्हें मिला निराशा, पक्षपात और सत्ता-परिवार की मनमानी।
लेकिन अब जनप्रतिनिधियों द्वारा उठाई गई आवाज़ ने इस मामले को जाँच, कार्रवाई और जवाबदेही की दिशा में मोड़ दिया है।
अधिकारियों की चुप्पी अब सवाल है.
क्या प्रशासन इस सत्ता-परिवार के प्रभाव में है.
या
क्या कानून सबके लिए समान है.
यह मामला सिर्फ अतिक्रमण का नहीं, यह लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट है.
नगर परिषद जयसिंहनगर में जो हो रहा है, वह किसी एक परिवार का मामला नहीं,
यह सार्वजनिक संसाधनों के निजी उपयोग, राजनीतिक शक्ति के दुरुपयोग, और संवैधानिक मर्यादा के पतन का उदाहरण है।
अब सवाल जनता का है.
क्या जयसिंहनगर में कानून चलेगा या फिर “अध्यक्ष पुत्र की राजनीति” का शासन.
The mukhbir के लिए राजेंद्र कुमार शर्मा (नीलू) कि रिपोर्ट









