क्या यह इंसाफ़ है या लापरवाही का सबसे काला चेहरा…
the mukhbir कि विशेष रिपोर्ट शहडोल। 11 अक्टूबर की वह मनहूस शाम जब अमलाई ओसीएम खदान हादसे में मजदूर अनिल कुशवाहा असमय ही काल के गाल में समा गया. अनिल कि मौत का वो लाईव वीडियो देखने वाले के दिल को झकझोर दिया। अनिल कि मौत का आज 53वॉ दिन हैं। परिजनों की शिकवा-शिकायत, पुकार, आंसू, दौड़ भाग और आरोपों के बावजूद पुलिस ने इतने लंबे इंतजार के बाद 28 नवम्बर 2025 को एफआईआर दर्ज की। पर यह सवाल अभी भी ज़िंदा है.
“पुलिस प्रशासन को इतना लम्बा समय क्यों लगा..? और इसके पीछे के ज़िम्मेदार कौन…?”
11 अक्टूबर को मौत… 28 नवंबर को एफआईआर
हादसा 11 अक्टूबर 2025 को शाम 5:10 बजे हुआ।
लेकिन प्राथमिकी दर्ज हुई 28 नवंबर की रात 8:12 बजे, वो भी तब जब परिजनों ने लगातार प्रशासन के दरवाज़े खटखटाए और स्थानीय मीडिया ने लगातार मुद्दा उठाया।
क्या इतनी देरी सामान्य है..?
या फिर किसी बड़े ‘कवर-अप’ की कोशिश..?
15 साल से बंद थी खदान…
परिजनों का बड़ा आरोप खदान पिछले 15 साल से बंद थी, फिर भी उसे सुरक्षित बताकर मजदूरों से काम क्यों करवाया गया। आरोपों में न चेतावनी बोर्ड, न सुरक्षा इंतज़ाम, न बचाव व्यवस्था…
सबकुछ नाम मात्र का अनिल आज तक बंद खदान में पानी में दफ़न है और इतनी खामोशी से उसकी मौत दर्ज कर दी गई। क्या बंद खदान में मजदूरों को भेजना सीधी-सीधी आपराधिक लापरवाही नहीं…
एसईसीएल और आरकेटीसी पर गंभीर आरोप, जिम्मेदारों के नाम गायब
परिजनों के शिकायत और बयान में खनन कंपनी और कॉन्ट्रैक्टर्स का नाम था। लेकिन शुरुआत में दर्ज रिपोर्ट में कई बड़े नाम ‘गायब’ कर दिए गए। क्यों, किसके दबाव और कौन-कौन बचाया जा रहा. धनपुरी थाना पुलिस ने जिन छह लोगों को आरोपी बनाया है, उनके नाम साफ़ इशारा करते हैं कि मामला सिर्फ एक हादसा नहीं—एक बड़ी प्रशासनिक विफलता है।
छह आरोपी, लेकिन क्या इतना काफी
एफआईआर में दर्ज नाम अयोध्या पटेल (माइन सारदार), नील कमल रजक (वरिष्ठ अधिकारी), प्रभाकर सिंह (पैन इंजीनियर), मुनशिप यादव (सुपरवाइजर आरकेटीसी), संजय यादव (सुपरवाइजर) अन्य जिम्मेदार कर्मचारी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता 106(1)(3)(5) एवं अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ है।
लेकिन 48 दिन की देरी, बयान देने वालों के नाम गायब करना, और खदान का 15 साल पुराना रिकॉर्ड सब इस तरफ इशारा करते हैं कि जो कुछ सामने आया है, वह पूरी सच्चाई नहीं है।

“कौन बचा रहा था किसे” द मुख़बिर का बड़ा सवाल
- क्या कंपनी और प्रशासन के बीच सेटिंग थी.
- क्यों एफआईआर 48 दिन तक रोकी गई.
- कौन से बड़े नाम अभी भी जांच से बाहर हैं.
- मजदूर की मौत का सच इतने दिनों तक दबाया गया.
- क्या गरीब की मौत के बाद भी सिस्टम सिर्फ कागज़ों में खेल खेलता रहेगा.
परिजनों की कहा “हमें इंसाफ़ चाहिए, कागज़ी कार्रवाई नहीं”
अनिल के परिवार का एक ही सवाल है—
“अगर खदान बंद थी, तो हमारा बेटा उसमें कैसे मर गया” यह सवाल केवल एक परिवार का नहीं, यह सवाल व्यवस्था का आईना है।
यह मामला अब सिर्फ हादसा नहीं.
यह सच, सिस्टम और सत्ता के धुएँ में खोई हुई वह कहानी है जिसे उजागर करना हर नागरिक का हक़ है।
सच्चाई की आग अभी बाकी है. The mukhbir उसे बुझने नहीं देगा।
Editor in chief the mukhbir-राहुल सिंह राणा











