
उमरिया में प्रभारी मंत्री की प्रेस वार्ता बनी औपचारिकता
The mukhbir तपस गुप्ता, उमरिया। जिले के पालक और प्रभारी मंत्री एवं प्रदेश शासन के अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री नागर सिंह चौहान की प्रेस वार्ता उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी। जिला पंचायत सभागार में आयोजित यह पत्रकार वार्ता न संवाद का मंच बन पाई, न ही जन सरोकारों का आईना। तय समय से देरी, सवालों से बचने का आरोप और जल्दबाज़ी में समापन, इन तीन बिंदुओं ने पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस की साख पर सवाल खड़े कर दिए।
जनसंपर्क विभाग ने पत्रकारों को दोपहर 12:30 बजे का समय दिया था, लेकिन मंत्री तय समय पर नहीं पहुंचे। सभागार में मौजूद पत्रकारों को लगभग एक घंटे तक इंतजार करना पड़ा। बैठक लंबी होने का हवाला दिया गया, पर इंतजार के दौरान कोई ठोस सूचना नहीं दी गई। हालात ऐसे बने कि कई पत्रकार नाराज होकर लौटने की तैयारी में थे। स्थिति बिगड़ती देख जनसंपर्क अधिकारी को हस्तक्षेप करना पड़ा और किसी तरह प्रेस वार्ता शुरू कराई गई।
करीब 1:30 बजे पत्रकारवार्ता का मंच संभालते ही मंत्री जी ने सरकार और पार्टी की उपलब्धियों का बखान शुरू किया। योजनाएं, विकास कार्य और शासन की कथित सफलताएं गिनाई जाती रहीं, लेकिन उमरिया की जमीनी हकीकत मंच से नदारद रही। स्थानीय समस्याएं, प्रशासनिक अव्यवस्थाएं, लंबित मांगें इन सब पर संवाद की अपेक्षा थी, लेकिन जैसे ही सवालों का दौर शुरू हुआ, जवाबों में स्पष्टता गायब दिखी।
पत्रकारों का आरोप है कि कई सवालों के उत्तर विषय से भटकाने वाले रहे, जबकि कुछ अहम सवालों को नजरअंदाज कर दिया गया। जब क्रमवार तरीके से जनहित से जुड़े प्रश्न उठने लगे, तो बिना संतोषजनक चर्चा के ही प्रेस वार्ता को अचानक समाप्त कर दिया गया। न तो सवालों की पूरी सूची सुनी गई, न ही जनता के मुद्दों पर कोई ठोस आश्वासन सामने आया।
इस घटनाक्रम के बाद पत्रकारों में गहरा असंतोष देखा गया। उनका कहना है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस केवल सरकारी उपलब्धियां गिनाने का मंच नहीं होती, बल्कि यह जनता और सत्ता के बीच सेतु का काम करती है। मीडिया के माध्यम से आम लोगों के सवाल शासन तक पहुंचते हैं और वहीं से जवाब जनता तक लौटते हैं। यदि सवालों से बचा जाए और संवाद से दूरी बनाई जाए, तो ऐसी प्रेस वार्ता महज औपचारिकता बनकर रह जाती है।
उमरिया में हुई यह प्रेस वार्ता यही संदेश छोड़ गई कि जन समस्याओं पर खुलकर बात करने के बजाय उपलब्धियों की सूची पढ़कर जिम्मेदारी पूरी समझ ली गई। सवाल यह है कि जब सवाल ही न सुने जाएं, तो जवाबदेही की बात कैसे की जाए!
The mukhbir के लिए उमरिया से तपस गुप्ता कि रिपोर्ट
Author: The Mukhbir
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